प्रेम में उल्टियां

     कभी कभी नए लोगो से मिलकर कुछ नए ज्ञान मिलते हैं जिनसे हम इतने अनजान होते हैं या सोचते रह जाते हैं कि जीवन में इतना घूम फिर कर भी ये बात क्यों नहीं सोची। किसी गहन बात पर चर्चा चलते हुए अचानक एक मित्र ने कहा " प्यार वो होता है जो समय पड़ने पर आपकी उल्टियां भी साफ कर सके " और भी कई बातें कहीं मगर कुछ दिनों से यही लाइन दिमाग में टनटना रही है। पहले तो उनकी बातों के कॉन्टेक्स्ट में ये बात घुलाने की कोशिश की, फिर भी पता नही क्यों ये किसी मिश्रण में अशुद्धि की तरह बार बार ऊपर की ओर तैरने लगता है। प्यार में उल्टियां साफ करना इसका क्या इंप्लीकेशन होगा। मान लीजिए मुझे उल्टी आ रही हो तो मैं पहले तो बेसिन या नाली की ओर भागूंगी या मेरे अलावा कोई भी हो यही करेगाा या मेरी स्थिति इतनी खराब होगी कि मैं अपने जगह से उठ ही नही पाई और मैने वही पर फैलाने का फैसला कर लिया तो कौन साफ करेगा? हां वो जो प्यार करता है वो तो जरूर करेगा जैसे मेरी मां, बहन, पापा, भाई (शायद वो दुष्ट नही करेगा और मेरी छोटी बहन भी न नुकुर करेगी फिर कुछ चारा न देख कर ही देगी)। और कौन करेगा? मेरी हेल्पर (काम वाली) जरूर करेगी या नही करेगी (उसकी मर्जी)। स्कूल के दिन याद करती हूं तो याद आती है वो दाई छोटे कद की सावली सी। बस दाई नाम से जानते थे उन्हें नाम कभी सुना ही नहीं। पूरे स्कूल की दाई! टीचर्स प्रिंसिपल, चपरासी, बच्चे सबकी दाई। तब पता था दाई मतलब फीमेल चपरासी । अब इस शब्द का असली मतलब पता चला है तो उनके प्रति बहुत सम्मान आता है मन में। दाई का मतलब है _ मां ।

स्कूल में बच्चे अक्सर उल्टियां कर देते थे। छोटे थे कुछ ऊट पटांग खा लिया स्कूल के बाहर के ठेलो पर, बीमार हुए और जबरदस्ती स्कूल भेज दिया गया और कर दी क्लास में उल्टी। फिर क्या एक ओर से आवाज उठती आचार्य जी दाई को बुलाना पड़ेगा फलाने उल्टी कर दिए हैं। और इसी बहाने क्लास के एक बच्चे को बाहर तफरी मारने का मौका मिल जाता दाई को बुलाने के लिए। दाई मुंह बनाए झाड़ू और बाल्टी भर पानी लिए क्लास में आती और घटना स्थल का मुआयना करके पहले उस उल्टी के उत्पादक को घूरती। "का खयिले रहा" हे जा उल्टी कईल जाला " "जा मुंह धो आवा और पानी पी लेह " "भिआन सकूल न आया" "ठीक हो जा तब आया" । क्लास साफ सुथरा करके वो चली जाए। हम सोचते थे कि दाई कितना गन्दा काम करती है। दाई को पैसे मिलते हैं तब करती हैं वरना क्यों करती। अब दाई मिलती तो उसको जरूर पूछती तुम्हे कैसा लगता था बताओ बच्चो की उल्टियां साफ करने में!! वो निश्चित ही ये तो नही कहेगी कि उसे बच्चो से प्यार था। उसे खराब तो लगता होगा मगर उसका काम था लेकिन उसे बच्चो की फिक्र भी थी। 

    कुछ और घटनाएं हैं उल्टियों से संबंधित अगर हौसला न टूटे तो पढ़िएगा। मुझे मोशन सिकनेस होती है और इसे मैने कई तरीके से कंट्रोल करने की कोशिश की है बचपन से मगर कई बार रायता भी फैलाया है। ये बड़ी ही आम बीमारी है जिसमे बंद गाड़ियों में बैठते ही आदमी अपना मोशन इमोशन और शक्तियां सब खो देता है और पेट के अंदर का खाना अपना रास्ता खो देता है फिर बड़ा ही विभत्स नज़ारा बन जाता है। मैं अपने कुछ पास और कुछ बहुत दूर के रिश्तेदारों के साथ एक पिकनिक पर जा रही थी । खुशियों का माहौल था। मगर मुझे गाड़ी में पीछे बिठाया गया। कुछ देर हंसते गाते सफर बीता फिर मैने माहौल में आग लगा दी । उस आग के छीटें उन सभी पर गिरे जो सचमुच मेरे बहुत दूर के रिश्तेदार थे। कुछ एक के तो सीधे आंखो में अंगार गिरा। सचमुच बहुत बुरा हुआ। मैं पूरे होश में कह सकती हूं उनमें से कोई मुझे प्यार नही करता था मगर उन सभी ने मेरी उल्टियां साफ की। मगर मुझे कुछ नही कहा। मुझे पानी पिलाया और ससम्मान विंडो सीट पर बैठाया। फिर साथ में हमने पिकनिक मनाई। 

    हाल ही में मेरे एक अग्रज के साथ यात्रा करते वक्त मुझे पता चला कि वो भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं तो एक अपनापन सा महसूस हुआ। फिर भी लाख कहने पर उन्होंने दवा नहीं ली और रास्ते में गाड़ी रुकते ही एक झरने के किनारे फैल गए। मुझे तो रहा नही गया संकोच करते हुए भी उनकी पीठ थपथपाने पहुंच गई। पानी पिलाया और फिर दवा भी दी । निश्चित ही मुझे उनसे प्यार नही था मगर इंसानियत थी। 

    तो इतना विचार करके अब मुझे समझ आया कि इंसानियत प्रेम और रिश्तों से पहले आती है। अगर आपने प्रेम करने के लिए एक अच्छे इंसान को चुना है तो इस परिभाषा की जरूरत नहीं होगी कि "प्यार वो हैं जो समय पड़ने पर आपकी उल्टियां भी साफ कर सके।" 

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