यही जीवन है

ना धूप चिर है ना बादल
कभी लगता है
अब बादल ही रहेंगे छितिज पर
विरह के हो या प्रेम के
कभी लगता है 
आसमान रोता है हम पर
तो कभी जैसे अमृत फुहारता हो
कभी लगती है
धूप सुनहरी जीवनदायिनी
कभी जलती मृत्यु सी भयंकर
पर ना धूप ना ही बादल 
कुछ चिर नहीं, कोई संयोग नहीं
वे ही हैं एक दूसरे के कारण, 
वे ही निवारण
एक संयत खोता है
दूसरा हावी होता है
यही जीवन है
जिसमें कोई साधु नहीं होता है।

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