घृणा नहीं है...

घृणा नहीं है पुरुषों से
ना बैर कोई 
मै तो खुद को तुमको
सबको इंसान मानती हूं
पैदा मै भी हुई थी ' इंसान '
फिर धीरे धीरे सीखा 
लड़की बनना
जब किसी ने कहा ' आइटम '
किसी ने कहीं हाथ लगाया
किसी ने बचपन के रिश्ते मिटा दिए
चादर की आड़ में, फिर भी
खौफ मन में रख बेखौफ होना सीखा 
दुपट्टा ओढ़ना, धीरे बोलना, 
बुरी नजरे झेलना
सब बड़ी काबिलियत से सीखा
फिर भी चाहत की तुम्हारी
क्योंकि जानती हूं सब एक से नहीं
तभी तो ढूंढ़ती हैं नज़र
भीड़ में एक हीरो
मगर चूक जाती हैं कभी कभी
हंस सा नीर क्षीर विवेक तो नहीं
ना ही है कोई ब्रह्म ज्ञान
बस अंदाज़ है परखने का
नज़र, छुअन, बातें और छठेंद्री
फिर भी प्रेम है तुमसे
घृणा नहीं
26 sept 2020

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