लड़की
मै डरपोक सी लड़की थी
सही गलत से खूब डरती थी
बचपन से यही सीखा था
बच बच के ही रहना है
बुरी नज़र को परखना है
गंदे स्पर्श से बचना है
नज़रे नीची रखनी है
बेशर्मों से ना उलझना है
विश्वास बस खुद पर करना है
औरों से मतलब ना रखना है
लड़की बनकर ही रहना है..
मगर ' मै '
अब भी डरपोक सी लड़की हूं
पर सही गलत भी समझती हूं
औरों पर विश्वास भी करती हूं
बेबस प्यार भी करती हूं
छूकर देखे कोई मुझे ज़रा
नज़रे नीची भी करवा देती हूं
दुनिया से मतलब रखती हूं
दुनियादारी भी खूब समझती हूं
नज़रे आसमान पर रखती हूं
हौसलों से अपने उड़ती हूं
हां अब भी मै एक लड़की हूं..
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