नदी की तरह...

नदी की तरह जिंदगी 
एक सोते से फूटती
कुछ ढोती कुछ छोड़,
आगे बढ़ जाती है
देख धरा की आकृति
उसमे ढल जाती है
व्याकुल हो कभी 
सारे बंध तोड़ जाती है
ठहरती कभी ना एक पल भी
बस बेबस चलती जाती है
देखा कभी ना जिस मोड़ को 
उस पर मुड़ जाती है
छोड़ अपना अस्तित्व इक दिन
अनहद सागर में मिल जाती है।
नदी जैसी जिंदगी 
बस एक लकीर छोड़ जाती है

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