टप्पू राम जी
अपने भुलक्कड़ मिजाज से परेशान मैं कभी कभी मुश्किल में भी पड़ जाती हूं मगर भला हो कि दुनिया में नेकनीयत लोगो की कमी नहीं....
एक छोटा सा किस्सा जिसके हीरो हैं "टप्पू राम" जी..
कुछ दिनों पहले ऐसी ही सर्द शाम में दोस्तो से मिलने गप्पे मारने शाम के वक्त लंका के हरे भरे (इंसानों से), ठूसम ठूस सड़को से गुजर कर हम चाय की दुकान तक पहुंचे।
मगर पहुंचने से पहले कुछ कामों के वास्ते कुछ एक दुकानों पर रुकते चले। थोड़ा थोड़ा काम उनके हवाले किया और आधे एक घंटे में लौटने का कह आगे चल दिए गप्पियाने। रोज की तरह लंका की सड़क ट्रैफिक से जाम और फुटपाथ खलिहार नौजवान लोगो से। तरह तरह के स्ट्रीट फूड वाले ठेलों और फुटपाथ की दुकानों को चारो ओर से घेरे भीड़ का एक बड़ा भाग और आस पास मंडराते छोटे छोटे मुफ्तखोर "मंगते"। इसमें कोई शक नहीं हमसे ज्यादा फास्ट फूडी ये लोग ही हुए हैं आज कल। उनके बीच से एक छटकता हुआ मेरे पास आया " ऐ दीदी! देदा...5 रुपिया...कुछ खिया दा...." मैं न ही कुछ देने न खिलाने की इच्छुक थी मगर मन पिघल ही जाता है लेकिन फिर पिघलते मन को रोक मैंने सोचा जैसे ही एक 5 का सिक्का निकलूंगी इनका हुजूम मुझे घेर लेगा फिर इन पर दया करना मेरी औकात से बाहर हो जाएगा। सीधा रास्ता साधते हुए निकल गई ना दाए देखा न बाए।
आगे एक भाई साहब दिखे... जाना पहचाना चेहरा लंबे घुंघराले बाल, इनकी आदत है कि ये कीप टू द लेफ्ट वाला भारतीय नियम नहीं मानते बल्कि फ्रांस, जर्मनी, रसिया जैसे एलएचटी रोड रूल वाले देशों की तर्ज पर कीप टू द राइट के हिसाब से चलते हैं और हमारे जैसे सभी लेफ्ट साइड वालो को इनके सम्मान में थोड़ा किनारा करना पड़ता है खास कर लड़कियों को। संभलते हुए इन्हें भी नजरंदाज करते हुए अपने गंतव्य पर पहुंची।
चाय पर चर्चा करने के बाद बिल के भुगतान करने की रस्म अदायगी वही करता है जिसकी फेलोशिप के पैसे अभी अभी आए हो। हमारा तो ये टर्न पिछले 2 महीने से आया नही था तो हमे अपने बटुए को याद करने की नौबत नहीं आई। वापस चलते वक्त अपने हाथ हल्के जान पड़े तो याद आया बटुआ तो है ही नही! फौरन दोस्तो को फोन मिलाया, क्या किसी को याद है कि मेरे हाथ में पर्स था या नहीं!, कुछ ने कहा देखा नहीं, कुछ ने बताया तुम तो खाली हाथ थी... दिमाग सकपकाया, धड़कने बढ़ने लगी ... भाग कर चाय की दुकान की ओर गई, सोचा भईया के हम रेगुलर कस्टमर हैं अगर पाया होगा तो जरूर दे देंगे।निराशा ही हाथ आई उन्हे कुछ नही मिला था। हालांकि 500 से ज्यादा पर्स में थे नही मगर 500 भी किसी इंसान की नियत खराब करने के लिए कम थोड़े ही हैं। मगर इतना तो तय है कि लंका के चाय समोसे वाले 500 के लिए झूठ नही बोलेंगे आखिर वो खुद भी हीरो से चलते हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं, बढ़िया कमाते हैं।
फिर याद आई टेलर आंटी। हां! उनके यहां जो झोला छोड़ा उसी में तो डाला था पर्स, वहां जरूर होगा। आंटी को आप बीती सुनाई तो आंटी ने पूरा झोला पलट दिया पर कछु न मिला। हाय राम! अब तो सर्प लोट रहा था दिल पर, रोने धोने का माहौल बन गया। सबसे बड़ा दुख था कि ना जाने कहां कहां दौड़ना होगा एटीएम कार्ड्स, वोटर आईडी, कॉलेज आईडी, लाइब्रेरी कार्ड्स फिर से बनवाने और किसी का प्यार से दिया हुआ एक छोटा सा बर्थडे कार्ड भी उसी बटुए में था वो भी गया। साथ में आई दोस्त ने कहा क्या पता आंटी झूठ बोल रही हो। आंटी पर शक हुआ फिर सोचा ये टेलर आंटी एक ब्लाउज सिलकर 500 कमा लेती है क्या ही करेंगी वो मेरे 500 का।
कहां तक पर्स हाथ में था कहां से फिसल गया कुछ याद नहीं आ रहा था। फोन लगा कर रूम की तलाशी करवा ली कहीं न मिला। अब सोच रही थी काश उस छोटूल्ले को ही 5 रुपिया दे दिया होता, कम से कम पर्स कब हाथ से फिसला ये तो याद आता। कहीं उसी लड़के ने तो नही... ! क्या पता शायद उसी ने...। या वो घुंघराले बाल वाला आदमी कहीं वो पॉकेट मारने के लिए ही तो नही कीप टू द राइट फॉलो करता है! अगर ऐसा हुआ है तो बेटा अब कुछ नहीं होगा। घर चलो, थोड़ा शोक मनाओ और कार्ड कागजात बनवाने की दौड़ में लग जाओ कल से। भारी मन घर की ओर मुड़े तभी याद आया एक काम तो जूते चप्पल बनाने वाले को भी देकर आई हूं उसे अपनी जैकेट की जिप सही करने के लिए दिया था उसे लेना जरूरी था लेकिन अब उसे पैसे कहां से दूंगी, पर्स तो है ही नही। अपनी दोस्त से उधारी की डील की और हम उस ओर चल दिए। भागम भाग करते देर तो हो ही चुकी थी। हम मोची की दुकान पर पहुंचे तो अपना सामान समेट कर ठंड से हाथ पांव सिकोड़े सड़क किनारे बैठे वो बस मेरा ही इंतजार कर रहे थे। मुझे देखकर तुरंत चौकन्ने होकर उठे और बोले, दीदी 25 रुपया हुआ और आपका सब समान भी सुरक्षित है। हमने पूछा कौन सा सामान भईया। उन्होंने कहा आप खुद देख लीजिए सब वैसे ही है पैसे भी गिन लीजिए जो जैसे था वैसे ही रख दिए हैं। मैं अब समझी कि मेरा पर्स तो इसी जैकेट की बड़ी सी जेब में ठूसा पड़ा था जो मैं इनके यहां देकर गई थी। ज़िप खराब होने के कारण जैकेट बदल ली थी मगर बटुआ उसी में छोड़ दिया।
धन्य हो भूलें लाल। पर्स खोल कर देखा तो एक एक नोट जस का तस था, नोट कम भी होते तो आज कोई फर्क नहीं पड़ता जरूरी तो ये था जो आज हमने सीखा कि बड़ी बड़ी दुकानों के सामने, चौराहे और फुटपाथ पर जरा सी जगह में एक बोरे पर अपने औजारों को सजाए बैठे ये कुशल कारीगर कमाते तो बहुत कम हैं शायद एक दिन में 500 भी नही, मगर इन्ही जैसे पैसों से गरीब पर दिल से अमीर लोगों की नेक नीयत से तो दुनिया में विश्वास कायम है।
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