गर्मी की छुट्टियां
गर्मी की छुट्टी, मतलब कि आज़ादी, मतलब कि नानी का घर, मतलब कि ढेर सारा ठाठ और घुमाई। जब मई आधी निकल जाती थी तब घर में सुगबुगाहट चालू हो जाती थी, कभी दादी से सोर्स लगाना कभी मामा से, कि कोई तो हिम्मत करे पापा से बात करने की कि अब हमे जाने दें नानी के घर। वरना 2 महीने की छूट्टी फुर्र से उड़ जाएगी। आज कल परसों में बीतने वाले एक एक दिन पहाड़ जैसे भारी लगते थे। नानी का घर ना तो किसी सुंदर पहाड़ी पर था ना किसी बाग बगीचों वाले गांव में। जैसा हमारा घर वैसा उनका भी। लेकिन वहां हमारा रुतबा ही अलग होता था जैसे कि हमारी मां कोई रानी और हम उनकी राजकुमारियां। हमारे पहुंचते ही वहां त्योहार जैसा माहौल बन जाता। रोज़ खाने को नई नहीं चीज़े बनती उसपर भी मामा बाज़ार से रोज़ कुछ ना कुछ लाना नहीं भूलते। मम्मी साल भर का जमा किया धन दौलत यहीं तो जी भर के खर्च करती वो भी ज्यादातर हमारे ही ऊपर। नानी हमे देख देख कर ही खुश होती और आशीर्वाद लुटाती रहती। उन सब के बीच एक सबसे ज्यादा समर्पित महिला थी हमारी मामी। हमारे जाने से निश्चित ही सबसे ज्यादा काम उनका ही बढ़ता लेकिन उनके चेहरे से मुस्कान तो मैंने कभी गायब नहीं होती। दोपहर का खाना खिलाने के बाद ही पूछ लेती शाम को नाश्ते में क्या खाओगी? छोटे कद की गोल मटोल खूबसूरत सी मामी शाम होने से पहले साज श्रृंगार कर रसोई में घुसती तो ताज़े लगे सिंदूर की लकीरें उनके चेहरे पर रेंगते हुए टपकती। जून की गर्मी में पकौड़े, चिप्स, इडली, डोसा, फारा, बफौरी शायद ही कभी कोई दिश रिपीट हुई हो महीने भर। वो जितने मन से हमे खिलाती उतने मन से हमारे साथ खेलती भी थी। दिन भर चूल्हे के तपने के बावजूद हमारे साथ लकड़ी कंडे पर लिट्टी चोखे बनाने को खुशी खुशी तैयार रहती थी। इसके अलावा मम्मी की चाचियां, उनकी बहुएं और ना जाने कौन कौन.. सबके घर हमारा बुलावा होता वहां भी खूब आदर सत्कार मिलता। प्यार तो सबके आंखो से टपकता था। पढ़ाई हमसे कोसो दूर हुआ करती थी और हम छुट्टी के आखिरी दिनों तक तो उसे भूल भी चुके होते थे कि तभी पापा का फोन आता कि अगले रविवार वो आने वाले हैं और हमें जैसे गहरा शोक घेर लेता। पापा दुश्मन लगने लगते और दादी का घर कोई जेल। नानी हमे नए कपड़े दिलाती और कोई रेसिपी छूट ना जाए इस वजह से मामी सुबह शाम दोनों वक्त रसोई में। हमारे शहंशाही के दिन बीतते तो हमे अपने स्कूल की गुलामी में मिले होमवर्क की भी याद आ ही जाती जिसे हम हर साल छुट्टी के आखिरी 10 दिनों के किया करते थे कैसे भी जीते मरते। उस आखिरी दिन जब पापा वहां पहुंचते तो अचानक वो सारी मेहमान नवाजी का केंद्र बन जाते हमे थोड़ा किनारे कर सारे घर वाले ऐसे उनकी खातिरदारी करते जैसे कोई राजा उनके घर आ गया हो। हम बच्चे भी सहमे सहमे कभी दरवाजे से कभी खिड़की से झांक लिया करते लेकिन उनके पास जाने कि हिम्मत नहीं करते। हमे वो अपने पापा जैसे विलेन लगते थे इस दिन। यूं तो रोज़ हम नानी के पैर दबाते लेकिन पापा के आते ही नानी बाबू बाबू करके उनके खातिर में दौड़ लगाने लगती। जाने के वक्त सब भीगी पलकें लिए हाथ हिलाते हमे तब तक देखते रहते जब तक गली मुड़ ना जाए और हम ओझल ना हो जाए।
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