Homo sapiens
Homo sapiens 👪
कभी आस पास छोटे छोटे नासमझ बच्चो को रोते चीखते देखती हूं तो उनकी मांओं पर बड़ी दया आती है। बच्चे... कच्ची अक्ल, जिद्दी स्वभाव , शरारती हरकते, विध्वंसक करामात कुल मिलाकर सिर दर्द, मगर मासूमियत ऐसी कि क्षण में पत्थर पिघला दें। उन्हे संभालना, पालना पोसना, सही ग़लत में अंतर समझाना बिल्कुल हिमालय पार करने जैसा कठिन है ये कठिन काम करने का साहस मां बाप उठाते है खासकर मां।
अगर इस दुनिया मे मां जैसी शख्सियत ना होती तो हम आज भी आदि मानव ही होते। वैसे भी शैश्ववस्था में हम ऑस्ट्रेलपिथिकस जैसे ही तो होते हैं जैसे वे ज्यादा समय पेड़ पर बिताते थे, कभी चार पैर पर जानवरों की तरह टहलते और कभी कभी खड़े होकर चलने में भी समर्थ थे, ठीक वैसे एक उम्र तक बच्चे ज्यादा समय घरवालों के गोद में चढ़े रहते, मस्ती में बकैया खीचते और पलंग के छोर पकड़ धीरे धीरे चलना सीखते हैं। घरवाले उन्हे सीधा चलना सिखाकर होमो इरेक्टस बनाते हैं। मालिश कर कर के उनके बंदर जैसे मुंह को दादी इंसानी मुंह का आकार देती है। खूब दूध दलिया खिला खिला कर नेअंडरथल की तरह हट्टा कट्टा बनने में मां और दादी कोई कसर नहीं छोड़ती और धीरे धीरे धर्म-कर्म भी सिखाती हैं। लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, वह मां के बेलन, चप्पल, झाड़ू के डर का है, जिसने सचमुच हमे होमो सैपियन्स बनाया। वरना इन नन्हे शैतानों को देखकर मुझे भय होता है कि ये ऐसे ही बड़े हो जाए तो बंदर भी इंसान से बेहतर होगा। धन्य हो मां का जो ऐसे बंदरो को इंसान बनाया।
Comments
Post a Comment