मुसाफिर

कभी एक बेहतरीन रास्ते के अंत पर अंधेरा सा होता है

कभी अंधेरे रास्ते एक रोशनी की आस में बहुत दूर ले जाते हैं

लेकिन न रास्तों का अंत है न कोई आखिरी मंजिल है वहां

निराशा -आशा- निराशा और फिर आशा यही खेल है

जिसे मंजिल समझते हैं एक दिन वो रास्ता बन जाता है दूसरी मंजिल के लिए

इस सफर का हिस्सा होना भी शायद एक मंजिल थी कभी

शायद वही पहली मंजिल हमने खो दी कहीं

जरा पूछो किसी मुसाफिर से कभी आखिरी मंजिल मिली उसे!

उस छोर पर जो अंधेरा या उजाला है वो रोक नही सकता हमे 

क्योंकि मुसाफिर होने की बड़ी कीमत अदा की है हमने 

सफर जुनून है हमारा और मंजिले तो बस हैं क्षण भर का सुकून






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