आधी आबादी ने जाना ही नही
आधी आबादी के मर्म को
आधी आबादी ने महसूस भी नही किया
आधी आबादी पर क्या बीतती है
जब बगल बैठे अंकल या दादा जैसे
कहीं भी छू जाते हैं दूसरी दिशा में देखते हुए
जब अंधेरे रास्ते से गुजरते हुए, छूट भईए जैसे
घूरते हैं फूंकते हुए बीड़ी सिगरेट या सूंघते हुए
मैं बताती हूं ! कि सपनो में उड़ता मन, अचानक तन पर आ गिरता है
मैं बताती हूं! तब किसी अनहोनी की कल्पना से दिल सहम जाता है
मैं बताती हूं! कि धड़कने रूक जाती हैं गला रूंध जाता है
मैं बताती हूं फिर या तो असंख्य चुप्पियां या तमाशे बनते है।
आप कहेंगे कि कपड़े छोटे थे
आप कहेंगे रात ज्यादा थी
आप कहेंगे अकेली क्यों थी
आप कहेंगे बायोलॉजी भी कुछ होती है
सब व्यर्थ होगा जब उस जगह आप होंगे
व्यर्थ है मेरा कहना क्योंकि आप नही हो सकते
सब व्यर्थ होगा क्योंकि इतिहास से नही सीखा आपने
व्यर्थ होगी आजादी जब युद्ध और दंगो में स्त्रियां लूटी जायेगी। ©Neelam
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